Current Affairs April 18, 2026: प्रोजेक्ट-75I और भारत-जर्मनी पनडुब्बी सौदा | Atharva Examwise Daily GK Update

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हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता और नौसैनिक प्रतिस्पर्धा के बीच, भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की 21 अप्रैल, 2026 से शुरू होने वाली जर्मनी की आधिकारिक यात्रा इस दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाली है । इस यात्रा का मुख्य एजेंडा 'प्रोजेक्ट-75I' (P-75I) के तहत छह आधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण के लिए लगभग 80,000 करोड़ से 99,000 करोड़ रुपये के सौदे को अंतिम रूप देना है । यह परियोजना न केवल भारतीय नौसेना की मारक क्षमता में क्रांतिकारी वृद्धि करेगी, बल्कि 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' के लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगी ।

प्रोजेक्ट-75I: भारतीय नौसेना की आगामी शक्ति का आधार

प्रोजेक्ट-75I भारतीय नौसेना की '30-वर्षीय पनडुब्बी निर्माण योजना' का दूसरा चरण है, जिसे 1999 में सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) द्वारा अनुमोदित किया गया था । इस योजना का उद्देश्य 2030 तक 24 आधुनिक पनडुब्बियों का एक बेड़ा तैयार करना था। प्रोजेक्ट-75 के तहत छह कलवरी-क्लास (स्कॉर्पीन) पनडुब्बियों का निर्माण पहले ही मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में किया जा चुका है, जिसमें अंतिम इकाई INS वाग्शीर को जनवरी 2025 में कमीशन किया गया था । प्रोजेक्ट-75I इसी कड़ी का अगला और अधिक उन्नत विस्तार है।

प्रोजेक्ट-75I के तहत बनने वाली छह पनडुब्बियां डीजल-इलेक्ट्रिक श्रेणी की होंगी, लेकिन ये अपनी पूर्ववर्ती पनडुब्बियों की तुलना में आकार में बड़ी, अधिक घातक और उन्नत तकनीकों से लैस होंगी । इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता 'एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन' (AIP) प्रणाली का एकीकरण है, जो इन्हें पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक और अदृश्य बनाती है । जर्मनी की प्रमुख रक्षा कंपनी 'थिसनक्रुप मरीन सिस्टम्स' (TKMS) इस परियोजना में तकनीकी भागीदार के रूप में कार्य करेगी, जो भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम MDL के साथ मिलकर इन पनडुब्बियों का स्वदेशी निर्माण करेगी ।

तकनीकी विश्लेषण: एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन (AIP) और इसकी मारक क्षमता

पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की सबसे बड़ी सीमा उनकी 'धीरज क्षमता' (endurance) होती है। इन पनडुब्बियों को अपनी बैटरियों को चार्ज करने के लिए हवा (ऑक्सीजन) की आवश्यकता होती है, जिसके लिए उन्हें हर 24 से 48 घंटों में सतह पर आना पड़ता है या 'स्नॉर्कलिंग' करनी पड़ती है । स्नॉर्कलिंग के दौरान पनडुब्बी दुश्मन के रडार और उपग्रहों की पकड़ में आने के लिए अतिसंवेदनशील हो जाती है। AIP तकनीक इसी जोखिम को समाप्त करती है।

AIP प्रणाली पनडुब्बी को बिना वायुमंडलीय ऑक्सीजन के उपयोग के हफ्तों तक पानी के अंदर रहने की अनुमति देती है । जर्मनी की TKMS द्वारा प्रस्तावित टाइप-214NG डिजाइन में फ्यूल-सेल आधारित AIP प्रणाली का उपयोग किया जाता है । यह तकनीक हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच एक इलेक्ट्रोकेमिकल प्रतिक्रिया के माध्यम से बिजली उत्पन्न करती है, जिससे कोई दहन (combustion) नहीं होता और न ही कोई शोर करने वाला गतिशील हिस्सा होता है ।

पनडुब्बी प्रणोदन प्रणालियों का तुलनात्मक विवरण

विशेषतापारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिकAIP युक्त पनडुब्बी (P-75I)परमाणु ऊर्जा चालित (SSN)
जलमग्न रहने की अवधि24 - 48 घंटेलगभग 14 दिनअनिश्चित काल (महीनों तक)
शोर का स्तरबहुत कम (बैटरी पर)न्यूनतम (फ्यूल सेल के कारण)मध्यम (कूलेंट पंप के कारण)
स्नॉर्कलिंग की आवश्यकताबार-बारअत्यंत कमशून्य
मुख्य कार्यतटीय रक्षा, घात लगानालंबी दूरी की गश्त, समुद्री नियंत्रणरणनीतिक निरोध, वैश्विक पहुंच
लागतकममध्यमअत्यंत उच्च

AIP तकनीक से लैस पनडुब्बियां परमाणु पनडुब्बियों की तुलना में भी शांत हो सकती हैं क्योंकि परमाणु रिएक्टरों को ठंडा करने के लिए लगातार चलने वाले पंपों का शोर एआईपी प्रणालियों में नहीं होता है । यह शांत संचालन अरब सागर और बंगाल की खाड़ी जैसे उथले और शोर-शराबे वाले पानी में भारतीय नौसेना को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त प्रदान करेगा, जहां दुश्मन के विमानवाहक पोतों और पनडुब्बियों का पता लगाना पहले से ही कठिन होता है ।

हथियार प्रणाली और युद्धक क्षमताएं

प्रोजेक्ट-75I के तहत निर्मित होने वाली पनडुब्बियां केवल अपनी अदृश्यता के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भारी मारक क्षमता के लिए भी जानी जाएंगी। ये पनडुब्बियां 'हंटर-किलर' भूमिका निभाने के साथ-साथ जमीनी लक्ष्यों पर सटीक प्रहार करने में सक्षम होंगी ।

ब्रह्मोस मिसाइल एकीकरण: TKMS ने टाइप-214 डिजाइन में ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को एकीकृत करने का प्रस्ताव दिया है । यह भारत को दुनिया की उन चुनिंदा नौसेनाओं में शामिल कर देगा जिनके पास पारंपरिक पनडुब्बियों से लंबी दूरी की सुपरसोनिक मिसाइलें दागने की क्षमता है ।

वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS): रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय संस्करण का पतवार (hull) मानक मॉडलों से बड़ा होगा (लगभग 3,000 टन), ताकि इसमें अधिक मिसाइलों और उन्नत सेंसरों के लिए जगह बनाई जा सके । इसमें वर्टिकल लॉन्च सिस्टम होने की संभावना है, जिससे निर्भय जैसी क्रूज मिसाइलों को भी दागा जा सकेगा ।

भारी टॉरपीडो और सेंसर: ये पनडुब्बियां उन्नत तार-निर्देशित टॉरपीडो और आधुनिक सोनार सूट से लैस होंगी, जो दुश्मन की गतिविधियों का लंबी दूरी से पता लगाने और उन्हें नष्ट करने में सक्षम होंगे ।

बहुआयामी मिशन: ये पनडुब्बियां एंटी-सरफेस वॉरफेयर (ASuW), एंटी-सबमरीन वॉरफेयर (ASW), खुफिया जानकारी जुटाने (ISR), और विशेष बलों (Special Forces) के ऑपरेशनों के लिए डिजाइन की गई हैं ।

सामरिक महत्व: हिंद महासागर में शक्ति संतुलन

प्रोजेक्ट-75I का तेजी से कार्यान्वयन भारत के लिए एक रणनीतिक अनिवार्यता बन गया है। इसका मुख्य कारण चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति और पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमताओं में हो रहा विस्तार है ।

चीन हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है और उसने जिबूती में एक सैन्य अड्डा स्थापित करने के साथ-साथ ग्वादर और हंबनटोटा जैसे बंदरगाहों तक पहुंच प्राप्त कर ली है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि चीन पाकिस्तान को आठ 'हांगोर-क्लास' (टाइप-039B) पनडुब्बियों की आपूर्ति कर रहा है, जो सभी AIP तकनीक से लैस हैं । यदि भारत समय पर अपनी पनडुब्बी बेड़े का आधुनिकीकरण नहीं करता है, तो एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जहां पाकिस्तान की पनडुब्बी मारक क्षमता भारत के बराबर या उससे अधिक हो जाए ।

प्रोजेक्ट-75I इस तकनीकी अंतर को पाटने का काम करेगा। यह भारतीय नौसेना को न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की क्षमता देगा, बल्कि समुद्री व्यापार मार्गों (SLOCs) की सुरक्षा और दुश्मन की नौसैनिक गतिविधियों को रोकने (Sea Denial) में भी सक्षम बनाएगा । 1971 के युद्ध के दौरान कराची बंदरगाह की घेराबंदी ने साबित किया था कि समुद्र पर नियंत्रण कैसे भूमि पर युद्ध के परिणाम को बदल सकता है। P-75I पनडुब्बियां भविष्य में इसी तरह के निरोध (deterrence) को और अधिक प्रभावी बनाएंगी ।

सामरिक साझेदारी मॉडल (SPM) और स्वदेशीकरण

प्रोजेक्ट-75I रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया के 'सामरिक साझेदारी मॉडल' (Strategic Partnership Model) के तहत कार्यान्वित होने वाली पहली प्रमुख परियोजना है । इस मॉडल का उद्देश्य रक्षा विनिर्माण में भारतीय निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाना और विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) के साथ दीर्घकालिक सहयोग स्थापित करना है ।

परियोजना के प्रमुख भागीदार

पक्षभूमिकाविवरण
भारतीय नौसेनाउपयोगकर्तापरिचालन आवश्यकताओं और विशिष्टताओं का निर्धारण।
मझगांव डॉक (MDL)भारतीय रणनीतिक भागीदारपनडुब्बियों के निर्माण, एकीकरण और परीक्षण के लिए जिम्मेदार।
TKMS (जर्मनी)विदेशी OEMडिजाइन प्राधिकरण, तकनीकी हस्तांतरण (ToT) और इंजीनियरिंग विशेषज्ञता प्रदान करना।
DRDOअनुसंधान एवं विकासस्वदेशी AIP मॉड्यूल के विकास और भविष्य के एकीकरण में सहयोग।

प्रोजेक्ट-75I के तहत स्वदेशीकरण की शर्तें अत्यंत कड़ी हैं। पहली पनडुब्बी में कम से कम 45% स्वदेशी सामग्री (Indigenous Content) होनी चाहिए, जिसे छठी और अंतिम पनडुब्बी तक बढ़ाकर 60% करने का लक्ष्य रखा गया है । यह न केवल भारत की निर्माण क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि एक व्यापक रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) भी तैयार करेगा, जिसमें सैकड़ों MSMEs शामिल होंगे ।

भारत-जर्मनी रक्षा औद्योगिक रोडमैप 2026

रक्षा मंत्री की यात्रा केवल एक पनडुब्बी सौदे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत और जर्मनी के बीच एक 'रणनीतिक रीसेट' का हिस्सा है। जनवरी 2026 में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने 'रक्षा औद्योगिक सहयोग रोडमैप' पर हस्ताक्षर किए थे । यह रोडमैप केवल खरीदार-विक्रेता संबंध से आगे बढ़कर सह-विकास और सह-उत्पादन की ओर बढ़ने का संकेत देता है।

जर्मनी ने पारंपरिक रूप से गैर-नाटो देशों को रक्षा निर्यात के प्रति संकोच दिखाया है, लेकिन यूक्रेन युद्ध और इंडो-पैसिफिक में चीन के आक्रामक रवैये ने बर्लिन की सोच में बदलाव किया है । अब जर्मनी भारत को एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भागीदार के रूप में देखता है।

रोडमैप के प्रमुख बिंदु:

निश (Niche) तकनीक में सहयोग: दोनों देश पनडुब्बी तकनीक, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और हेलीकॉप्टर बाधा बचाव प्रणाली जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम करेंगे ।

सैन्य अभ्यास: जर्मनी 2026 में भारत द्वारा आयोजित बहुराष्ट्रीय वायु युद्ध अभ्यास 'तरंग शक्ति' और नौसैनिक अभ्यास 'मिलान' में भाग लेगा ।

निर्यात मंजूरी: जर्मनी ने रक्षा उपकरणों के लिए निर्यात मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे भारतीय रक्षा क्षेत्र में जर्मन कंपनियों की भागीदारी आसान हो जाएगी ।

IFC-IOR में भागीदारी: जर्मनी भारत के 'सूचना संलयन केंद्र - हिंद महासागर क्षेत्र' (IFC-IOR) में एक संपर्क अधिकारी तैनात करेगा, जो समुद्री डोमेन जागरूकता में सहयोग बढ़ाएगा ।

चुनौतियां और भविष्य की राह

इतनी बड़ी और जटिल परियोजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं जिनका समाधान समयबद्ध तरीके से आवश्यक है:

अत्यधिक विलंब: P-75I की अवधारणा 1999 में बनी थी, लेकिन वास्तविक अनुबंध 2026 में होने की उम्मीद है। इस 27 साल के अंतराल ने न केवल लागत को बढ़ाया है, बल्कि नौसेना की परिचालन तत्परता पर भी दबाव डाला है ।

लागत में वृद्धि: प्रारंभिक अनुमानों की तुलना में परियोजना की लागत लगभग दोगुनी होकर ₹1,00,000 करोड़ के करीब पहुंच गई है ।

स्वदेशी AIP का परीक्षण: DRDO द्वारा विकसित स्वदेशी AIP का भूमि-आधारित परीक्षण सफल रहा है, लेकिन इसे समुद्र में साबित करना और मौजूदा कलवरी-क्लास पनडुब्बियों में एकीकृत करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है ।

निर्माण की समयसीमा: पनडुब्बी निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें 7-10 साल लगते हैं। पहली डिलीवरी 2032-33 के आसपास होने की संभावना है, जिसका अर्थ है कि भारत को तब तक अपने पुराने बेड़े का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना होगा ।

इन चुनौतियों के बावजूद, P-75I भारत के लिए एक गेम-चेंजर है। यह न केवल भारतीय नौसेना को एक अदृश्य शिकारी के रूप में स्थापित करेगा, बल्कि भारत को भविष्य की 'प्रोजेक्ट-76' जैसी पूर्णतः स्वदेशी पनडुब्बी परियोजनाओं के लिए आवश्यक डिजाइन और निर्माण कौशल भी प्रदान करेगा ।

यूपीएससी और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इसका महत्व (Why this matters for your exam preparation)

प्रोजेक्ट-75I और भारत-जर्मनी पनडुब्बी सौदा यूपीएससी (UPSC) के सामान्य अध्ययन (General Studies) के विभिन्न प्रश्नपत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

GS पेपर-II (अंतरराष्ट्रीय संबंध): भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलती भू-राजनीति, और रक्षा कूटनीति। जर्मनी की रक्षा निर्यात नीति में बदलाव और इसके वैश्विक निहितार्थ।

GS पेपर-III (विज्ञान और प्रौद्योगिकी): एयर इंडिपेंडेंट प्रॉपल्शन (AIP) तकनीक की कार्यप्रणाली, फ्यूल सेल बनाम स्टर्लिंग इंजन, सोनार (SONAR) और संचार तकनीक (VLF/ELF)। स्वदेशीकरण और 'आत्मनिर्भर भारत' का रक्षा क्षेत्र में प्रभाव।

GS पेपर-III (आंतरिक और समुद्री सुरक्षा): हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा चुनौतियां, चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' और भारत की प्रतिक्रिया, समुद्री नियंत्रण (Sea Control) बनाम समुद्री निषेध (Sea Denial) की रणनीतियां।

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims): 'मेक इन इंडिया', 'सामरिक साझेदारी मॉडल', ब्रह्मोस मिसाइल के विभिन्न संस्करण, और भारतीय नौसेना की विभिन्न पनडुब्बी श्रेणियों (कलवरी, शिशुमार, सिंधुघोष) के बारे में सीधे प्रश्न पूछे जा सकते हैं।

[संबंधित लेख: भारत का 30-वर्षीय पनडुब्बी निर्माण कार्यक्रम - Atharva Examwise]

यह परियोजना इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का खरीदार नहीं रहना चाहता, बल्कि एक निर्माता और निर्यातक बनने की ओर अग्रसर है। एक गंभीर अभ्यर्थी के रूप में, आपको इस सौदे के केवल वित्तीय पहलुओं को ही नहीं, बल्कि इसके पीछे की तकनीकी गहराई और सामरिक दूरदर्शिता को भी समझना चाहिए।

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