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भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे के इतिहास में अप्रैल 2026 का समय एक युगांतकारी मोड़ के रूप में दर्ज किया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा संसद के विशेष सत्र में पेश किए गए तीन महत्वपूर्ण विधेयकों—संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक 2026, परिसीमन विधेयक 2026, और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026—ने देश की चुनावी राजनीति और प्रतिनिधित्व के भविष्य को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है । परिसीमन, जिसे साधारण शब्दों में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण के रूप में जाना जाता है, इस बार केवल भौगोलिक परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण अधिनियम 2023) को धरातल पर उतारने की एक महत्वाकांक्षी योजना है ।

एथर्व एग्जामवाइज (Atharva Examwise) के इस विस्तृत विश्लेषण में, हम परिसीमन की संवैधानिक प्रक्रिया, इसके ऐतिहासिक विकास, उत्तर-दक्षिण राज्यों के बीच शक्ति संतुलन की चुनौतियों और आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इसके महत्व का सूक्ष्म अध्ययन करेंगे। यह रिपोर्ट गंभीर यूपीएससी (UPSC) अभ्यर्थियों के लिए तैयार की गई है, जो इस विषय के कानूनी, राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को गहराई से समझना चाहते हैं।

परिसीमन का अर्थ और संवैधानिक आधार

परिसीमन (Delimitation) का शाब्दिक अर्थ है किसी देश या विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं या सीमाओं को तय करने की क्रिया या प्रक्रिया । इसका प्राथमिक उद्देश्य जनसंख्या के बदलते स्वरूप के साथ प्रतिनिधित्व को न्यायसंगत बनाए रखना है। लोकतंत्र के मूल सिद्धांत "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" (One Person, One Vote, One Value) को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि लगभग समान संख्या में नागरिकों का प्रतिनिधित्व करे ।

भारतीय संविधान में परिसीमन की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं:

संवैधानिक अनुच्छेदमुख्य प्रावधान और अधिदेश
अनुच्छेद 81लोकसभा की संरचना को परिभाषित करता है। यह निर्दिष्ट करता है कि राज्यों को सीटों का आवंटन इस प्रकार होना चाहिए कि सीटों की संख्या और जनसंख्या का अनुपात सभी राज्यों में समान हो ।
अनुच्छेद 82प्रत्येक जनगणना (Census) की समाप्ति पर संसद को एक 'परिसीमन अधिनियम' पारित करने और एक परिसीमन आयोग गठित करने का अधिकार देता है ।
अनुच्छेद 170प्रत्येक जनगणना के बाद राज्यों की विधानसभाओं के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन और विभाजन का प्रावधान करता है ।
अनुच्छेद 327संसद को निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन सहित चुनावों से संबंधित प्रावधान बनाने की व्यापक शक्ति प्रदान करता है ।
अनुच्छेद 329परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती देने पर रोक लगाता है, जिससे चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप के कारण होने वाली देरी को रोका जा सके ।
अनुच्छेद 330 और 332क्रमशः लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए सीटों के आरक्षण को जनसंख्या के अनुपात में सुनिश्चित करते हैं ।

परिसीमन की यह प्रक्रिया जनसंख्या घनत्व और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर नगर निगम के वार्डों से लेकर लोकसभा सीटों तक लागू होती है [परिसीमन आयोग का अभी तक चार बार हो चुका गठन]।

परिसीमन आयोग: संरचना और शक्तियां

परिसीमन आयोग एक उच्च-शक्ति संपन्न वैधानिक और अर्ध-न्यायिक निकाय है, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा निर्वाचन आयोग के सहयोग से की जाती है । इसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए इसकी संरचना को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखा गया है।

आयोग की संरचना

संशोधित विधेयक के अनुसार, परिसीमन आयोग में निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं :

अध्यक्ष: सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त या कार्यरत न्यायाधीश ।

पदेन सदस्य: मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त ।

राज्य सदस्य: संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त ।

सहयोगी सदस्य: प्रत्येक राज्य के लिए दस सहयोगी सदस्य (5 लोकसभा सांसद और 5 राज्य विधानसभा सदस्य) नियुक्त किए जाते हैं। ये सदस्य आयोग की कार्यवाही में सहायता करते हैं, लेकिन उन्हें अंतिम निर्णय लेने या मतदान करने का अधिकार नहीं होता ।

आयोग की कार्यप्रणाली और शक्ति

परिसीमन आयोग जनगणना के आंकड़ों का गहन अध्ययन करता है और यह देखता है कि किस क्षेत्र की जनसंख्या में कितनी वृद्धि या कमी हुई है [परिसीमन आयोग का अभी तक चार बार हो चुका गठन]। आयोग का कार्य केवल सीमाओं को खींचना नहीं है, बल्कि एससी/एसटी और अब महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की पहचान करना भी है ।

आयोग के आदेशों को 'भारत के राजपत्र' (Gazette of India) में प्रकाशित किया जाता है और इनका प्रभाव कानून के समान होता है । इन आदेशों को संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है । आयोग द्वारा प्रस्तावित ड्राफ्ट पर जनता से सुझाव और आपत्तियां मांगी जाती हैं, जिसके बाद सार्वजनिक सुनवाई की प्रक्रिया अपनाई जाती है ।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: परिसीमन पर रोक और संशोधन

स्वतंत्रता के बाद से अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया जा चुका है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में ।

आयोग का वर्षआधार अधिनियमजनगणना का आधारमुख्य विशेषता
1952परिसीमन आयोग अधिनियम, 19521951पहली बार निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण और एससी/एसटी सीटों का आरक्षण ।
1963परिसीमन आयोग अधिनियम, 196219611956 के राज्य पुनर्गठन के बाद सीटों का पुनर्समायोजन ।
1973परिसीमन अधिनियम, 19721971लोकसभा सीटों की संख्या 522 से बढ़ाकर 543 की गई ।
2002परिसीमन अधिनियम, 20022001राज्यों के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बदला गया, लेकिन कुल सीटों को स्थिर रखा गया ।

सीटों का 'फ्रीज' (Freeze) और इसके पीछे का तर्क

1976 में आपातकाल के दौरान, संविधान में 42वां संशोधन किया गया, जिसने 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2001 तक के लिए स्थिर (Freeze) कर दिया । इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह था कि जो राज्य (विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्य) परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू कर रहे थे, उन्हें कम जनसंख्या वृद्धि के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान न उठाना पड़े ।

2001 में, 84वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस रोक को अगले 25 वर्षों यानी 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया । इसके बाद 87वें संशोधन (2003) ने निर्वाचन क्षेत्रों के आंतरिक पुनर्निर्धारण के लिए 2001 की जनगणना के उपयोग की अनुमति दी, लेकिन राज्यों को आवंटित कुल सीटों की संख्या 1971 के स्तर पर ही बनी रही ।

2026 का नया रोडमैप: 850 सीटों का विस्तार

वर्तमान सरकार द्वारा पेश किए गए नए प्रस्तावों के अनुसार, लोकसभा की कुल सदस्य संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने की योजना है ।

सीटों का वितरण और संरचना

नए ढांचे के तहत सीटों का प्रस्तावित वितरण इस प्रकार है :

राज्यों के लिए सीटें: 815 (वर्तमान में लगभग 530 के मुकाबले भारी वृद्धि)।

केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सीटें: 35 (वर्तमान 20 के मुकाबले वृद्धि)।

कुल प्रस्तावित क्षमता: 850 सीटें।

सरकार का तर्क है कि भारत की जनसंख्या 1971 के बाद से दोगुनी से अधिक हो गई है, जिससे एक सांसद पर जनसंख्या का बोझ अत्यधिक बढ़ गया है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या केरल या तमिलनाडु के निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक है । सीटों के विस्तार से प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता में सुधार होगा और निर्वाचन क्षेत्र अधिक प्रबंधनीय होंगे ।

जनगणना 2011 का उपयोग और प्रक्रिया का सरलीकरण

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की एक सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह परिसीमन के लिए "वर्ष 2026 के बाद की पहली जनगणना" की प्रतीक्षा करने की अनिवार्यता को समाप्त करने का प्रस्ताव करता है । इसके बजाय, विधेयक संसद को यह शक्ति देता है कि वह किसी भी प्रकाशित जनगणना (जैसे कि 2011 की जनगणना) को आधार मानकर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर सके । यह कदम महिला आरक्षण को 2029 के चुनावों से पहले लागू करने के लिए उठाया गया है ।

महिला आरक्षण और परिसीमन का अंतर्संबंध

नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है । हालाँकि, इस कानून के कार्यान्वयन को परिसीमन की प्रक्रिया के साथ जोड़ दिया गया था ।

आरक्षण लागू करने की बाधाएं और समाधान

विपक्ष का आरोप था कि परिसीमन और जनगणना के साथ आरक्षण को जोड़ना इसे अनिश्चित काल के लिए टालने की एक चाल है । लेकिन 2026 के नए विधेयकों के माध्यम से, सरकार ने परिसीमन को फास्ट-ट्रैक करने का मार्ग प्रशस्त किया है ।

रोटेशन प्रणाली: महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें प्रत्येक परिसीमन चक्र के बाद रोटेट (बदली) की जाएंगी ।

उप-आरक्षण: 33% महिला कोटे के भीतर ही अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान होगा ।

समय सीमा: यह आरक्षण प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए होगा, जिसे बाद में संसद द्वारा बढ़ाया जा सकता है ।

परिसीमन के बिना महिला आरक्षण लागू करना इसलिए कठिन था क्योंकि यह तय करना आवश्यक था कि कौन से विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्र महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे और क्या सीटों की कुल संख्या बढ़ाए बिना इसे लागू करने से मौजूदा प्रतिनिधित्व प्रभावित होगा ।

उत्तर-दक्षिण विभाजन: संघवाद की चुनौती

परिसीमन के प्रस्ताव ने भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) में एक गहरी चिंता पैदा कर दी है, जिसे अक्सर 'उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन' के रूप में देखा जाता है ।

दक्षिण भारतीय राज्यों की आपत्तियां

तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों का तर्क है कि उन्होंने केंद्र सरकार के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को निष्ठापूर्वक लागू किया है । यदि परिसीमन केवल वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो इन राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी कम हो जाएगी, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सीटें नाटकीय रूप से बढ़ जाएंगी ।

राज्यवर्तमान सीटें (543 में से)अनुमानित सीटें (शुद्ध जनसंख्या आधारित 543 में)
उत्तर प्रदेश80128
बिहार4070
तमिलनाडु3930
केरल2014
आंध्र प्रदेश2521

सरकार का 'प्रो राटा' (Pro Rata) समाधान

दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए, केंद्र सरकार ने 50% की समान वृद्धि का मॉडल प्रस्तावित किया है । इस मॉडल के तहत, किसी भी राज्य की सीटों में कटौती नहीं की जाएगी, बल्कि सभी राज्यों की सीटों को मौजूदा अनुपात में लगभग 50% बढ़ा दिया जाएगा ।

गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, इस 50% वृद्धि मॉडल के तहत दक्षिणी राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी, और सदन में उनकी कुल हिस्सेदारी लगभग 24% पर बनी रहेगी ।

राज्यवर्तमान सीटें50% वृद्धि के बाद नई सीटें (अनुमानित)कुल सदन में हिस्सा (%)
कर्नाटक28425.14%
आंध्र प्रदेश25384.65%
तेलंगाना17263.18%
तमिलनाडु39597.23%
केरल20303.67%

यह 'विस्तार मॉडल' एक रणनीतिक प्रयास है ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर जाने से बचाया जा सके ।

आर्थिक और प्रशासनिक निहितार्थ

परिसीमन का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, इसके गहरे आर्थिक और प्रशासनिक परिणाम भी होंगे।

वित्त आयोग और राजस्व वितरण

राज्यों के बीच केंद्रीय करों का बंटवारा वित्त आयोग द्वारा किया जाता है, जो जनसंख्या को एक महत्वपूर्ण कारक मानता है । दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि वे देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 30% का योगदान देते हैं, लेकिन जनसंख्या कम होने के कारण उन्हें करों का कम हिस्सा मिलता है । 16वें वित्त आयोग ने इस असंतुलन को दूर करने के लिए 'जनसांख्यिकीय प्रदर्शन' (Demographic Performance) और 'GDP में योगदान' को 10-10% वेटेज दिया है, जिससे उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों का हिस्सा थोड़ा कम हुआ है और दक्षिणी राज्यों का बढ़ा है ।

चुनावी कॉलेज और राष्ट्रपति चुनाव

संसद और विधानसभा सीटों में बदलाव से राष्ट्रपति के चुनाव के लिए 'इलेक्टोरल कॉलेज' का गणित पूरी तरह बदल जाएगा । यदि उत्तर भारतीय राज्यों के विधायकों और सांसदों की संख्या में भारी वृद्धि होती है, तो राष्ट्रपति के चुनाव में उनकी भूमिका निर्णायक हो जाएगी, जो संघवाद के संतुलन को प्रभावित कर सकता है ।

परिसीमन की प्रक्रिया: चरण-दर-चरण

परिसीमन आयोग एक व्यवस्थित प्रक्रिया का पालन करता है ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके :

आंकड़ों का विश्लेषण: आयोग नवीनतम जनगणना (प्रस्तावित मामले में 2011 या आगामी आंकड़े) का अध्ययन करता है ।

सीटों का निर्धारण: प्रत्येक राज्य के लिए लोकसभा और विधानसभा सीटों की कुल संख्या तय की जाती है ।

भौगोलिक सीमाएं: निर्वाचन क्षेत्रों की भौतिक सीमाओं को प्रशासनिक इकाइयों (जैसे जिला, तहसील) और भौगोलिक विशेषताओं के साथ संरेखित किया जाता है ।

ड्राफ्ट प्रकाशन: प्रस्ताव को भारत के राजपत्र और राज्य के राजपत्रों में प्रकाशित किया जाता है ।

सार्वजनिक परामर्श: जनता से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं और सार्वजनिक सुनवाई की जाती है ।

अंतिम अधिसूचना: राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद, अंतिम आदेश राजपत्र में प्रकाशित होते हैं और कानून का रूप ले लेते हैं ।

आलोचनात्मक विश्लेषण और चुनौतियां

परिसीमन की वर्तमान योजना को लेकर कई विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने चिंताएं व्यक्त की हैं:

पारदर्शिता का अभाव: पिछले परिसीमन आयोगों पर डेटा और कार्यप्रणाली साझा न करने के आरोप लगे हैं ।

2011 की जनगणना की प्रासंगिकता: आलोचकों का कहना है कि 15 साल पुराने आंकड़ों का उपयोग करना वर्तमान जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के साथ अन्याय होगा, विशेषकर शहरीकरण की तीव्र गति को देखते हुए ।

न्यायिक समीक्षा की कमी: अनुच्छेद 329 के तहत आयोग के आदेशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिसे कुछ लोग लोकतांत्रिक जवाबदेही के विरुद्ध मानते हैं ।

गेरीमेंडरिंग (Gerrymandering) का जोखिम: ऐसी आशंकाएं जताई गई हैं कि सीमाओं का निर्धारण सत्ताधारी दल के राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है, जैसा कि असम के परिसीमन के दौरान कुछ वर्गों द्वारा आरोप लगाया गया था ।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts)

यूपीएससी और अन्य परीक्षाओं के लिए निम्नलिखित डेटा अत्यंत महत्वपूर्ण है:

प्रथम परिसीमन आयोग: 1952

अंतिम परिसीमन आयोग: 2002 (कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में)

संविधान का अनुच्छेद 82: संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम का निर्माण

42वां संशोधन (1976): 2001 तक सीटों पर रोक

84वां संशोधन (2001): 2026 तक सीटों पर रोक बढ़ाना

प्रस्तावित 131वां संशोधन: लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाना

महिला आरक्षण (106वां संशोधन): 33% आरक्षण, परिसीमन के बाद लागू होगा

परिसीमन आयोग की शक्तियां: इसके आदेशों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती

निष्कर्ष: लोकतंत्र का पुनर्निर्माण

2026 का परिसीमन केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सुधारों में से एक है । लोकसभा की सीटों को 850 करना और उसमें महिलाओं की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधि बनाएगा । हालाँकि, इस प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार दक्षिण भारतीय राज्यों की 'संघीय चिंताओं' को कितनी संवेदनशीलता से संबोधित करती है । "एक वोट, एक मूल्य" और "सहकारी संघवाद" के बीच संतुलन बनाना ही आगामी परिसीमन की सबसे बड़ी चुनौती होगी ।

एथर्व एग्जामवाइज की सलाह है कि अभ्यर्थी इस विषय को केवल राजनीति के चश्मे से न देखें, बल्कि इसके संवैधानिक आधार (GS Paper 2), सामाजिक न्याय (महिला और SC/ST प्रतिनिधित्व) और आर्थिक संघवाद के व्यापक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करें।

Why this matters for your exam preparation

परिसीमन और लोकसभा विस्तार का विषय यूपीएससी (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निम्नलिखित कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

UPSC GS Paper 2 (Polity): यह विषय सीधे तौर पर 'संवैधानिक संशोधन', 'प्रतिनिधित्व' और 'संघीय संरचना' से जुड़ा है। अनुच्छेद 82, 170, 327 और 329 पर सीधे प्रश्न पूछे जा सकते हैं ।

Current Affairs (Prelims): 131वां संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन आयोग की संरचना और महिला आरक्षण (106वां संशोधन) की बारीकियों से बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) बनने की प्रबल संभावना है ।

Mains Answer Writing: 'उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन' और 'जनसंख्या नियंत्रण बनाम राजनीतिक प्रतिनिधित्व' जैसे विषयों पर विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अभ्यर्थी को 50% विस्तार मॉडल और वित्त आयोग के फॉर्मूले का उपयोग करके संतुलित उत्तर लिखने की आवश्यकता होगी ।

Essay and Interview: चुनावी सुधार और लोकतंत्र में महिलाओं की भूमिका जैसे विषयों पर निबंध लिखने के लिए यह एक ठोस आधार प्रदान करता है। साक्षात्कार (Personality Test) के दौरान, उम्मीदवार की संघीय संतुलन और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों पर राय महत्वपूर्ण हो सकती है ।

Historical Context: परिसीमन का इतिहास (1952-2002) और आपातकाल के दौरान किए गए संशोधनों (42nd Amendment) की समझ इतिहास और राजनीति विज्ञान के बीच के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करती है ।

गंभीर अभ्यर्थियों को परिसीमन आयोग के गठन की प्रक्रिया, इसके स्वतंत्र स्वरूप और आगामी 2029 के चुनावों पर इसके संभावित प्रभावों का नियमित फॉलो-अप रखना चाहिए। एथर्व एग्जामवाइज (Atharva Examwise) आपको निरंतर ऐसे अपडेट प्रदान करता रहेगा।