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परिचय: प्राचीन शिल्पकला के माध्यम से भारत की जीवित विरासत का संरक्षण

पश्चिम बंगाल के बाँकुड़ा ज़िले में स्थित बिकना डोकरा गाँव भारत की अत्यंत समृद्ध और प्राचीन हस्तशिल्प परंपराओं का एक जीवंत प्रमाण है। बाँकुड़ा रेलवे स्टेशन से मात्र 15 मिनट की दूरी पर स्थित यह छोटा सा गाँव केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है—यह मानव इतिहास की सबसे पुरानी धातु निर्माण तकनीकों में से एक, लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग विधि, के संरक्षण का प्रतीक है, जिसकी उम्र 4,000 से 5,000 वर्ष मानी जाती है।

UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए, बिकना डोकरा को समझना भारत की सांस्कृतिक विरासत, सरकारी संरक्षण पहलों और परंपरा व आधुनिक पर्यटन अर्थव्यवस्था के बीच के संबंधों पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है।

डोकरा कला क्या है? एक प्राचीन तकनीक को समझना

लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग विधि

डोकरा कला (जिसे धोकड़ा भी कहा जाता है) एक अलौह धातु ढलाई तकनीक है, जिसमें प्राचीन लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग विधि का उपयोग किया जाता है। यह जटिल प्रक्रिया विश्व की सबसे पुरानी धातु कार्य परंपराओं में से एक मानी जाती है। पुरातात्विक साक्ष्य इसके उद्गम को सिंधु घाटी सभ्यता के मोहनजोदड़ो काल (लगभग 4,000–5,000 वर्ष पूर्व) से जोड़ते हैं।

इस तकनीक को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब पुरातत्वविदों ने मोहनजोदड़ो से प्रसिद्ध ‘नृत्य करती बालिका’ (Dancing Girl) की प्रतिमा खोजी, जिसे इसी विधि से बनाया गया था। यह खोज इस बात का निर्णायक प्रमाण है कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता से हज़ारों वर्ष पहले ही भारतीय कारीगरों के पास उन्नत धातु-कार्य ज्ञान था।

शिल्प निर्माण प्रक्रिया: 13 चरणों की कलात्मक यात्रा

डोकरा निर्माण प्रक्रिया अत्यंत श्रमसाध्य होती है और इसमें असाधारण कौशल की आवश्यकता होती है।

चरण-दर-चरण प्रक्रिया:

मिट्टी के कोर का निर्माण – सबसे पहले कारीगर अंतिम धातु आकृति के मोटे रूप में मिट्टी का कोर बनाते हैं।

मोम की परत चढ़ाना – मिट्टी के कोर को शुद्ध मधुमोम (Beeswax), अगाथिस डम्मारा वृक्ष की प्राकृतिक राल और नट ऑयल के मिश्रण से ढका जाता है।

सूक्ष्म नक्काशी – पारंपरिक हाथ के औज़ारों से मोम की परत पर बारीक डिज़ाइन और अलंकरण उकेरे जाते हैं।

मिट्टी के साँचे की परतें – मोम के ऊपर कई परतों में मिट्टी लगाई जाती है, जिससे नकारात्मक साँचा बनता है।

ड्रेनेज डक्ट बनाना – साँचे में छोटे छिद्र छोड़े जाते हैं ताकि गरम करने पर मोम बाहर निकल सके।

भट्टी में पकाना – पूरे साँचे को पारंपरिक भट्टियों में गरम किया जाता है; मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है (इसी कारण इसे ‘लॉस्ट-वैक्स’ कहा जाता है)।

पिघली धातु की तैयारी – पीतल या कांसा (अक्सर पुनर्चक्रित स्क्रैप धातु) को अत्यधिक तापमान पर पिघलाया जाता है।

ढलाई (Pouring) – पिघली धातु को सावधानीपूर्वक खाली खोखले स्थान में डाला जाता है।

ठंडा करना – धातु ठंडी होकर ठोस बन जाती है और मोम के मूल डिज़ाइन का सटीक रूप ले लेती है।

साँचा तोड़ना – ठंडा होने के बाद बाहरी मिट्टी का साँचा तोड़कर धातु की आकृति निकाली जाती है।

अंदरूनी कोर हटाना – धातु के भीतर मौजूद मिट्टी के कोर को निकाला जाता है।

फिनिशिंग – पारंपरिक औज़ारों से सतह को पॉलिश और परिष्कृत किया जाता है।

गुणवत्ता जाँच – हर कृति की दोषों और कलात्मक गुणवत्ता के लिए जाँच की जाती है।

प्रयुक्त प्रमुख सामग्री:

मुख्य धातुएँ: पीतल और कांसा (अलौह धातुएँ)

मोम स्रोत: शुद्ध मधुमोम और प्राकृतिक वृक्ष राल

कच्चा माल: प्रायः पुनर्चक्रित स्क्रैप धातु (सतत प्रथाओं को बढ़ावा)

हर कृति क्यों होती है अनूठी

डोकरा कला की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि हर कृति पूरी तरह अद्वितीय होती है। लॉस्ट-वैक्स प्रक्रिया में ढलाई के बाद साँचा नष्ट हो जाता है, इसलिए एक जैसी दो वस्तुएँ कभी नहीं बन सकतीं। यही विशेषता डोकरा कलाकृतियों को विश्वभर के संग्राहकों और संग्रहालयों में अत्यंत मूल्यवान बनाती है।

बिकना डोकरा गाँव: सांस्कृतिक केंद्र

स्थान और भौगोलिक महत्त्व

स्थान विवरण:

राज्य: पश्चिम बंगाल

ज़िला: बाँकुड़ा

बाँकुड़ा शहर से दूरी: लगभग 2 किमी

कोलकाता से दूरी: लगभग 220 किमी

पहुँच: बाँकुड़ा रेलवे स्टेशन से 15 मिनट की दूरी

बाँकुड़ा ज़िला ऐतिहासिक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है। इसका नाम मल्ल वंश के राजा बीर हम्बीर से जुड़ा है। यह ज़िला बंगाल के ‘राढ़ क्षेत्र’ का हिस्सा है, जो अपनी लाल लेटराइट मिट्टी और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है।

धोकरा डमर समुदाय

बिकना के कारीगर धोकरा डमर समुदाय से संबंध रखते हैं—एक प्राचीन धातु-शिल्पी जनजाति, जिसकी उत्पत्ति छत्तीसगढ़ मानी जाती है और जो समय के साथ झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल तक फैली। ‘धोकरा’ उपनाम सीधे उनके पारंपरिक पेशे—लॉस्ट-वैक्स धातु ढलाई—से जुड़ा है।

समुदाय की विशेषताएँ:

पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण

जनजातीय परंपराओं का शिल्प में गहरा समावेश

मौखिक परंपरा और व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से ज्ञान संप्रेषण

आधुनिकीकरण के दबाव के बावजूद पारंपरिक विधियों का संरक्षण

सरकारी पहलें: बिकना के कारीगरों को समर्थन

UNESCO साझेदारी और ग्रामीण शिल्प केंद्र (2013–2014)

2013 में पश्चिम बंगाल सरकार और UNESCO के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) ने बिकना के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ पैदा किया। इसके तहत ग्रामीण शिल्प केंद्र (Rural Craft Hubs) स्थापित किए गए, जिनमें बिकना शुरुआती चयनित स्थानों में से एक था।

मुख्य बिंदु:

मॉडल: UNESCO का “Art for Life” विकास मॉडल

प्रारंभिक चरण: 2014 में 10 शिल्प स्थलों की स्थापना

विस्तार: बाद में 15 ग्रामीण शिल्प एवं संस्कृति केंद्र

लाभार्थी: लगभग 20,000 शिल्प परिवार

बिस्वा बांग्ला पहल: बाज़ार से जुड़ाव और वैश्विक पहुँच

बिस्वा बांग्ला कॉरपोरेशन, पश्चिम बंगाल की आधिकारिक हस्तशिल्प संवर्धन संस्था, ने डोकरा कला के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मुख्य हस्तक्षेप:

गुणवत्ता मानकीकरण – राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला, जमशेदपुर के सहयोग से उन्नत भट्टियाँ

बाज़ार पहुँच – प्रमुख भारतीय शहरों में शोरूम

ई-कॉमर्स एकीकरण – वैश्विक ऑनलाइन बिक्री

ब्रांड पैकेजिंग – कारीगर प्रोफ़ाइल और शिल्प दस्तावेज़

भौगोलिक संकेतक (GI) टैग – बिकना और दरियापुर के डोकरा शिल्प को GI टैग

व्यापार मेले – राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेलों में भागीदारी

उत्पाद विविधीकरण – पारंपरिक तकनीक के साथ आधुनिक डिज़ाइन

पर्यटन एकीकरण: “टेक्सटाइल को पर्यटन से जोड़ना”

यद्यपि बिकना डोकरा केंद्रीय सरकार की आधिकारिक “Linking Textile with Tourism” योजना के आठ चयनित गाँवों में शामिल नहीं है, फिर भी पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वतंत्र रूप से पर्यटन ढाँचा विकसित किया है।

पर्यटन विकास:

ग्राम संसाधन केंद्र

लाइव डेमोंस्ट्रेशन और कार्यशालाएँ

नवंबर में वार्षिक डोकरा उत्सव

कारीगरों से प्रत्यक्ष खरीद

उत्पाद और कलात्मक अभिव्यक्ति

पारंपरिक और समकालीन कृतियाँ

धार्मिक वस्तुएँ:

हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ

बौद्ध और जैन प्रतिमाएँ

मंदिर सजावटी वस्तुएँ

पारंपरिक शिल्प:

बाँकुड़ा घोड़ा

मोर, उल्लू, हाथी आदि

मानव आकृतियाँ और दैनिक जीवन दृश्य

आधुनिक सजावटी वस्तुएँ:

टेबल लैंप

आभूषण

दीवार सजावट

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

कारीगर आजीविका

सैकड़ों परिवारों की आय का स्रोत

महिला सहभागिता में वृद्धि

पर्यटन से सहायक रोज़गार

GI टैग का प्रभाव:

ब्रांड संरक्षण

प्रीमियम मूल्य

अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता

चुनौतियाँ और भविष्य

मशीन-निर्मित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा

कच्चे माल की बढ़ती लागत

युवा पीढ़ी का पलायन

बाज़ार अस्थिरता

परीक्षा तैयारी के लिए महत्त्व

GS Paper I: प्राचीन इतिहास और सभ्यता

GS Paper II: शासन और सामाजिक मुद्दे

GS Paper III: अर्थव्यवस्था, GI टैग, पर्यटन

UNESCO और सांस्कृतिक संरक्षण

त्वरित तथ्य (Quick Facts)

पहलूविवरण
शिल्प नामडोकरा (लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग)
गाँवबिकना (बिकना)
स्थानबाँकुड़ा, पश्चिम बंगाल
शिल्प की आयु4,000–5,000 वर्ष
समुदायधोकरा डमर
सामग्रीपीतल, कांसा, मधुमोम
UNESCO साझेदारी2013
GI टैगबिकना और दरियापुर

निष्कर्ष: प्राचीन तकनीक से आधुनिक अवसर तक

बिकना डोकरा केवल एक गाँव नहीं, बल्कि प्राचीन ज्ञान प्रणालियों की दृढ़ता, सरकार-समुदाय साझेदारी की शक्ति और सांस्कृतिक गर्व पर आधारित सतत विकास की संभावना का प्रतीक है।

UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह एक समग्र केस स्टडी है—संस्कृति, शासन, अर्थव्यवस्था और सतत विकास का। परंपरा के इन सूत्रों को समझिए, और IAS परीक्षा की जटिलताओं को भी समझ पाएँगे।

यह लेख Atharva Examwise की प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार की गई व्यापक करंट अफेयर्स श्रृंखला का हिस्सा है।