UPSC Current Affairs June 8, 2026: भारत का रिकॉर्ड मसाला निर्यात और जैव विविधता संपदा | Daily GK Update

featured project

भारत को ऐतिहासिक रूप से 'मसालों की भूमि' के रूप में जाना जाता है, और आज भी यह वैश्विक स्तर पर मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक देश बना हुआ है । वर्तमान में वैश्विक स्तर पर उपयोग किए जाने वाले कुल मसालों का लगभग 25% हिस्सा अकेले भारत में उगाया जाता है, जो दुनिया के 180 से अधिक देशों की रसोई तक अपनी पहुँच बना रहा है । यदि आप current affairs June 8, 2026 की तैयारी कर रहे हैं, तो यह विश्लेषण मुख्य परीक्षा (Mains) के सामान्य अध्ययन पेपर-3 (GS Paper 3) के कृषि, अर्थव्यवस्था और जैव विविधता खंड के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

नवीनतम Atharva Examwise current news के अनुसार, भारत ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में 17.99 लाख टन मसालों और संबद्ध उत्पादों का निर्यात करके ₹39,994.48 करोड़ (लगभग 4.72 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का सर्वकालिक उच्च रिकॉर्ड कायम किया है । इसके अतिरिक्त, भारत की भौगोलिक संपदा केवल मसालों तक सीमित नहीं है; यह विश्व के 17 महा-विविधता (Mega-Biodiverse) वाले देशों में से एक है, जहाँ 15,000 औषधीय पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं ।

यह लेख daily GK update और UPSC current affairs के दृष्टिकोण से इस संपूर्ण क्षेत्र का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भारत का मसाला निर्यात क्षेत्र: एक सांख्यिकीय विश्लेषण

पिछले एक दशक में भारत के मसाला निर्यात में असाधारण वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2024-25 तक देश का मसाला निर्यात मात्रा के मामले में लगभग दोगुना हो गया है ।

मसाला निर्यात की इस विकास दर को समझने के लिए निम्नलिखित तालिका का अवलोकन करें:

मापदंड (Parameter)वित्तीय वर्ष 2013-14वित्तीय वर्ष 2024-25दशक की कुल वृद्धि (%)
कुल निर्यात मात्रा8,17,250 मीट्रिक टन17,99,000 मीट्रिक टन~88% की वृद्धि
कुल निर्यात मूल्य (USD)$2.26 बिलियन$4.72 बिलियन~97% की वृद्धि
कुल निर्यात मूल्य (INR)उपलब्ध नहीं₹39,994.48 करोड़-

इस सांख्यिकीय वृद्धि को और अधिक स्पष्ट करने के लिए स्पाइसेस बोर्ड ऑफ इंडिया (Spices Board of India) के आंकड़े दर्शाते हैं कि वित्तीय वर्ष 2023-24 (15.40 लाख टन मूल्य ₹36,958.80 करोड़) की तुलना में वर्ष 2024-25 में निर्यात की मात्रा में 17% और रुपये के मूल्य में 8% की वृद्धि दर्ज की गई है ।

परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Competitive Exams)

competitive exam news today के अंतर्गत निम्नलिखित डेटा पॉइंट्स को सीधे प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के उत्तरों में उपयोग किया जा सकता है:

शीर्ष उत्पादक राज्य: वित्तीय वर्ष 2023-24 में मध्य प्रदेश 3.63 मिलियन टन के साथ भारत का सबसे बड़ा मसाला उत्पादक राज्य बनकर उभरा । इसके बाद गुजरात (1.29 मिलियन टन) और आंध्र प्रदेश (1.28 मिलियन टन) का स्थान आता है ।

निर्यात में राज्यों का योगदान: कुल निर्यात मूल्य में 23.53% की हिस्सेदारी के साथ गुजरात देश में शीर्ष पर है, जिसके बाद केरल और आंध्र प्रदेश का स्थान आता है । कर्नाटक देश का छठा सबसे बड़ा मसाला उत्पादक राज्य है, जो मुख्य रूप से काली मिर्च, छोटी इलायची, ब्यादगी मिर्च, हल्दी और अदरक का निर्यात करता है ।

निर्यात विविधता: वर्तमान में भारत से 52 अलग-अलग प्रकार के मसालों और उनके उत्पादों का निर्यात किया जाता है, जो सीधे तौर पर स्पाइसेस बोर्ड के नियमन के अधीन आते हैं ।

प्रमुख निर्यात गंतव्य: भारत के कुल मसाला निर्यात का 60% से अधिक हिस्सा केवल 10 देशों को जाता है, जिनमें चीन, अमेरिका, यूएई, बांग्लादेश, थाईलैंड, मलेशिया, यूके, सऊदी अरब, इंडोनेशिया और जर्मनी शामिल हैं ।

वस्तु-वार निर्यात: लाल मिर्च (Chilli) भारत का सबसे अधिक निर्यात होने वाला मसाला है, जो कुल निर्यात मात्रा का 25% से अधिक हिस्सा कवर करता है । वित्तीय वर्ष 2023-24 में मिर्च का कुल निर्यात मूल्य $1,508.94 मिलियन था, जिसके बाद क्रमशः जीरा ($700.23 मिलियन) और मिंट उत्पाद/ओलियोरेसिन्स ($498.01 मिलियन) का स्थान रहा ।

निर्यात क्षेत्र के समक्ष ढांचागत और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ

यद्यपि भारत ने मसाला निर्यात में ऐतिहासिक आंकड़े हासिल किए हैं, परंतु भविष्य में वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी को बनाए रखने के लिए देश को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

1. भू-राजनीतिक संवेदनशीलता और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान

वैश्विक संघर्षों का असर भारतीय कृषि-व्यापार पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया (West Asia) संकट और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों, विशेष रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), में व्यवधान आया है । इसके चलते मार्च 2026 में भारत का मासिक मसाला निर्यात मार्च 2025 के 2.34 लाख टन से घटकर 1.57 लाख टन रह गया (लगभग 33% की गिरावट) । इस व्यवधान के कारण काली मिर्च, जीरा, हल्दी और इलायची जैसी प्रमुख फसलों की लगभग 77,117 टन की खेप समय पर यूरोप और स्वतंत्र देशों के राष्ट्रकुल (CIS) देशों में नहीं भेजी जा सकी, जिससे देश को ₹854.37 करोड़ के विदेशी मुद्रा घाटे का सामना करना पड़ा और वार्षिक राजस्व घटकर ₹39,140 करोड़ रह गया ।

2. निम्न मूल्य संवर्धन (Low Value Addition)

भारत वैश्विक मसाला बाजार ($20 बिलियन) का लगभग 25% नियंत्रित करता है । हालांकि, अधिक मुनाफे वाले 'सीज़निंग और मसाला मिश्रण' (Seasoning Market - $14 बिलियन मूल्य) में भारत की हिस्सेदारी केवल 0.7% है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 12% और अमेरिका की 11% है । इसका मुख्य कारण यह है कि भारत के कुल मसाला निर्यात का केवल 48% ही मूल्य-वर्धित (Value-Added) उत्पाद जैसे ओलियोरेसिन्स, अर्क और न्यूट्रास्युटिकल्स के रूप में होता है; शेष 52% कच्चा और बिना प्रसंस्कृत मसाला होता है । वर्ष 2030 तक $10 बिलियन के निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मूल्य-वर्धित उत्पादों के निर्यात को 48% से बढ़ाकर 70% करना अनिवार्य है ।

3. गैर-शुल्क बाधाएं और गुणवत्ता मानकों की कठोरता

सिंगापुर, हांगकांग और यूरोपीय संघ (EU) जैसे देशों में भारतीय मसाला ब्रांड्स में एथिलीन ऑक्साइड (Ethylene Oxide - ETO) के अवशेष पाए जाने के कारण गुणवत्ता मानकों पर गंभीर सवाल उठे हैं । FSSAI के परीक्षणों में लगभग 12% घरेलू नमूने गैर-मानक पाए गए । निर्यात बाजारों में स्वीकार्यता के लिए अब निर्यातकों को कड़े रासायनिक परीक्षणों से गुजरना पड़ रहा है, जहां एथिलीन ऑक्साइड का स्तर 0.01 ppm से कम होना आवश्यक है । इसके लिए उन्नत स्टीम स्टेरलाइजेशन इकाइयों और जीसी-एमएस (GC-MS) लैब्स की स्थापना की जा रही है ।

4. जलवायु परिवर्तन और बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा

भारत के पारंपरिक एकाधिकार को चीन और वियतनाम जैसे देशों से कड़ी टक्कर मिल रही है :

चीन का प्रभाव: चीन अब जीरा और मिर्च के क्षेत्र में बड़े प्रतिस्पर्धी के रूप में उभरा है । वह भारत से कच्ची मिर्च आयात करके उसे संसाधित करता है और 'पपरिका' और 'तेजा' किस्मों के रूप में पुन: निर्यात करता है । वहीं भारत में प्रतिकूल मौसम के कारण मिर्च के रकबे में 35% और जीरे के रकबे में 7-8% की गिरावट आई है ।

वियतनाम का प्रभाव: काली मिर्च के मामले में वियतनाम वैश्विक नेता बन चुका है, जिसने वर्ष 2024 में $1.1 बिलियन से अधिक की काली मिर्च का निर्यात किया ।

नीतिगत प्रयास और सरकारी योजनाएं

भारतीय मसाला क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार ने कई प्रमुख पहलों की शुरुआत की है:

SPICED योजना: स्पाइसेस बोर्ड द्वारा शुरू की गई SPICED (Sustainability in Spice Sector through Progressive, Innovative, and Collaborative Interventions for Export Development) योजना का उद्देश्य पोस्ट-हार्वेस्ट गुणवत्ता में सुधार करना, जैविक खेती को बढ़ावा देना और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को सीधे निर्यातकों से जोड़ना है ।

स्पाइसेस पार्क्स (Spices Parks): प्रसंस्करण और गुणवत्ता परीक्षण को सुगम बनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में बुनियादी ढांचे के रूप में स्पाइसेस पार्क्स का निर्माण किया गया है । हालांकि, गुंटूर (आंध्र प्रदेश) जैसे प्रमुख पार्कों में 100 से अधिक भूखंडों में से केवल 20-30 इकाइयां ही सक्रिय हैं, जो इनके कम उपयोग (Underutilization) की समस्या को दर्शाती हैं ।

व्यापारिक समझौते: भारत-यूएई व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) के तहत जीरा जैसे प्रमुख भारतीय मसालों पर आयात शुल्क को 0% कर दिया गया है, जिससे खाड़ी देशों में निर्यात सुगम हुआ है ।

भारत की जैव विविधता संपदा और औषधीय पौधे

मसाला उत्पादन के साथ-साथ भारत की समृद्ध जैव विविधता इसकी एक और बड़ी आर्थिक और रणनीतिक शक्ति है। भारत दुनिया के केवल 2.4% भूमि क्षेत्र पर स्थित होने के बावजूद दुनिया की लगभग 7-8% दर्ज प्रजातियों का घर है, जिसके कारण इसे विश्व के 17 'मेगा-बायोडायवर्स' देशों में स्थान प्राप्त है ।

पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में उपयोग

देश में पाई जाने वाली 15,000 औषधीय पौधों की प्रजातियों में से लगभग 8,000 प्रजातियों का उपयोग विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में किया जाता है :

चिकित्सा प्रणाली (Traditional System)प्रयुक्त औषधीय पौधों की प्रजातियाँ
आयुर्वेद (Ayurveda)~7,000 प्रजातियाँ
यूनानी (Unani)~700 प्रजातियाँ
सिद्धा (Siddha)~600 प्रजातियाँ
आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine)~30 प्रजातियाँ

भारत में औषधीय पौधों की वार्षिक घरेलू मांग 5,12,000 मीट्रिक टन से अधिक है और भारत विश्व स्तर पर औषधीय पौधों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है ।

राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) और संरक्षण के उपाय

केंद्रीय योजना और बजट: आयुष मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) वित्तीय वर्ष 2021-2026 की अवधि के लिए ₹322.41 करोड़ के कुल वित्तीय परिव्यय के साथ औषधीय पौधों के संरक्षण और सतत प्रबंधन के लिए केंद्रीय क्षेत्र की योजना चला रहा है ।

इन-सीटू (In-situ) संरक्षण: प्राकृतिक आवासों में पौधों को बचाने के लिए देश भर में 115 औषधीय पादप संरक्षण और विकास क्षेत्र (MPCAs) स्थापित किए गए हैं । इसके अलावा, राष्ट्रीय बीज जीन बैंक (NBPGR, नई दिल्ली) में औषधीय और सुगंधित पौधों के 9,361 जीन संस्करणों को सुरक्षित रखा गया है ।

डिजिटल पहल (e-CHARAK): किसानों, संग्रहकर्ताओं और व्यापारियों के बीच बाजार की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए 'e-CHARAK' मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल का संचालन किया जा रहा है । यह स्थानीय भाषाओं में 25 प्रमुख हर्बल मंडियों से 100 औषधीय पौधों के पाक्षिक बाजार मूल्यों की जानकारी प्रदान करता है ।

विश्व वन्यजीव दिवस 2026: 3 मार्च 2026 को मनाए गए विश्व वन्यजीव दिवस की थीम "औषधीय और सुगंधित पौधे: स्वास्थ्य, विरासत और आजीविका का संरक्षण" (Medicinal and Aromatic Plants: Conserving Health, Heritage and Livelihoods) थी, जो मानव स्वास्थ्य और आजीविका में पौधों की महत्ता को रेखांकित करती है । अधिक जानकारी के लिए अभ्यर्थी(https://www.un.org/en/observances/world-wildlife-day) का संदर्भ ले सकते हैं ।

भौगोलिक संकेतक (GI Tags) के माध्यम से विरासत का संरक्षण

भारत औषधीय और कृषि संपदा की प्रमाणिकता बनाए रखने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत भौगोलिक संकेतक (GI Tags) का उपयोग करता है :

नवारा चावल (Navara Rice): केरल के पालक्कड़ जिले का यह चावल आयुर्वेद में 'षष्टिकाशाली' के रूप में प्रसिद्ध है, जिसका उपयोग पंचकर्म की 'नवरकिजी' थेरेपी में आमवाती दर्द और तंत्रिका विकारों के इलाज के लिए किया जाता है ।

हरी इलायची (Green Cardamom): इसके अंतर्गत केरल की 'एलेप्पी हरी इलायची' और कर्नाटक की 'कोर्ग हरी इलायची' को जीआई सुरक्षा प्राप्त है ।

गंजम केवड़ा का फूल (Ganjam Kewda): ओडिशा का यह फूल नेत्र रोगों और श्वसन विकारों की पारंपरिक औषधियों में काम आता है ।

कश्मीर केसर (Kashmir Saffron): आयुर्वेद में 'कुमकुम' के नाम से विख्यात यह उत्पाद घावों को भरने और त्वचा विकारों के इलाज में उपयोग किया जाता है ।

नागौरी अश्वगंधा (Nagauri Ashwagandha): राजस्थान के नागौर क्षेत्र की इस एडाप्टोजेनिक जड़ी-बूटी को 24 नवंबर 2025 को जीआई पंजीकरण (आवेदन संख्या 1143) प्रदान किया गया ।

Why this matters for your exam preparation

यह विषय प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर UPSC सिविल सेवा परीक्षा के दृष्टिकोण से बहुआयामी प्रासंगिकता रखता है:

GS Paper 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि): भारत का निर्यात ढांचा, व्यापार संतुलन, और कृषि मूल्य श्रृंखला (Value Chain) मुख्य परीक्षा के प्रत्यक्ष पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। मसाला निर्यात में मूल्य संवर्धन की आवश्यकता (48% से बढ़ाकर 70% करना) और चीन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे बिंदु मुख्य परीक्षा के उत्तरों में ठोस तर्क प्रदान करते हैं ।

GS Paper 3 (जैव विविधता और पर्यावरण): भारत के मेगा-बायोडायवर्सिटी देश के दर्जे पर आधारित प्रश्न, औषधीय पौधों के इन-सीटू और एक्स-सीटू संरक्षण के सरकारी तंत्र (NMPB योजनाएं, जीन बैंक), और जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों (जैसे मिर्च और जीरा) के उत्पादन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को पर्यावरण खंड में पूछा जा सकता है ।

GS Paper 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध और सरकारी नीतियां): वैश्विक भू-राजनीति (जैसे लाल सागर या हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट) का घरेलू कृषि निर्यात पर प्रभाव यह समझने में मदद करता है कि वैश्विक अशांति किस प्रकार स्थानीय स्तर पर किसानों की आय को प्रभावित करती है । साथ ही, जीआई टैगिंग (जैसे नागौरी अश्वगंधा) पारंपरिक ज्ञान की रक्षा और ग्रामीण विकास में बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) की भूमिका को स्पष्ट करती है ।

अपनी तैयारी को और अधिक धार देने के लिए परीक्षार्थी(https://www.atharvaexamwise.com/upsc-current-affairs) अनुभाग से जुड़ सकते हैं और रोज़ाना की महत्वपूर्ण खबरों के लिए competitive exam news today को ट्रैक कर सकते हैं।